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What is GDP ?

2019 में हमारे देश की हालत बहुत खराब चल रही है कई Infrastructure Plant बंद हो गए है जिससे लाखो workers बे रोजगार हो गए और चारो तरफ यही चर्चा हो रही की हमारे देश की GDP 5% क्यों होगई है लेकिन कुछ लोगो को तो पता भी नहीं है की आखिर GDP  होती क्या है आज हम इस Post में यही समझायेंगे की जीडीपी क्या होती है इसके डाऊन होने से या ग्रो होने से हमारे देश को क्या फरक पड़ता है

What is GDP

GDP का मतलब ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट होता है (जीडीपी) किसी भी देश की आर्थिक सेहत को calculate करने का  एक जरिया है और भारत में जीडीपी की गणना प्रत्येक तिमाही में होती है जिस तरह से स्कूल्ज में बच्चो की पढ़ाई या उसकी नॉलेज  के लिए हर तीन महीने में पेपर्स होते है उसी तरह जीडीप भी देश की हालत जानने के लिए तीन महीने में क्या जाता है और जीडीपी का मार्क्स देश में बनायीं जानने वाली चीजों के बढ़ने या घटने पर उसके हिसाब से आता है इनमे सिर्फ वहीँ चीजे होती है जोकि हमरे देश में बानी हो नाकि हम ने किसी और देश मंगवाई है।  

जीडीपी का परिचय 

जीडीपी सब्द को अमेरिका के एक अर्थशास्त्री साइमन ने 1935-40 के दौरान इस्तेमाल किया था इस सब्द को साइमन उस समय अमेरिका को परिचय कराया था जब दुनिया की बैंक संस्थाए आर्थिक विकाश का अनुमान यानी calculate करने का काम कर रही थी और तभी साइमन ने इस सब्द को अमेरिका की कांग्रेस में परिभासित करके दिखाया तो उसके बाद से आईएमएफ यानी अंतरास्ट्री मुद्रा कोष ने इस शब्द को इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।  

जीडीपी दो तरह से प्रस्तुत होता है 

जीडीपी दो तरह से प्रस्तुत किया जाता है।  क्यूंकि उत्पादन की कीमते  महंगाई के साथ घटती बढ़ती रहती है।  यह पैमाना है कॉन्टेंट प्राइस का जिसमे जीडीपी की दर व् उत्पादन का मूल्य एक आधार वर्ष में उत्पादन की कीमत पर तय होती है जबकि दूसरा पैमाना करेंट प्राइस है जिसमे उत्पादन वर्ष की महंगाई दर शामिल होती है

(कांस्टेंट प्राइस)

कांस्टेंट प्राइस में भारत का सांख्यिकी विभाग उत्पादन व् सेवाओं के मूल्यांकन के लिए एक आधार वर्ष यानि बेस ईयर तय करता है।  इस वर्ष में के दौरान कीमतों को आधार बनाकर उत्‍पादन की कीमत और तुलनात्‍मक वृद्धि दर तय की जाती है और यही कॉस्‍टैंट प्राइस जीडीपी है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि जीडीपी की दर को महंगाई से अलग रखकर सही ढ़ंग से मापा जा सके।  

(करेंट प्राइस) में 

जीडीपी के उत्‍पादन मूल्‍य में अगर महंगाई की दर को जोड़ दिया जाए तो हमें आर्थिक उत्‍पादन की मौजूदा कीमत हासिल हो जाती है। यानि कि आपको कॉस्‍टैंट प्राइस जीडीपी को तात्‍कालिक महंगाई दर से जोड़ना होता है।

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