MP Board Class 10th Hindi Chapter 14 शबरी Solutions

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शबरी  परीक्षोपयोगी अतिरिक्त प्रश्नोत्तर अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. दिए गए कथनों के लिए सही विकल्प का चयन कीजिए।

1. डॉ. प्रेम भारती का जन्म हुआ था
1. उत्तर-प्रदेश में
2. आन्ध्र-प्रदेश में
3. मध्य-प्रदेश में
4. हिमाचल प्रदेश में।
उत्तर 3. मध्य-प्रदेश में

2. डॉ. प्रेम भारती ने पी-एच. डी. की
1. लघु पत्रिकाओं पर
2. कहानियों पर
3. उपन्यासों पर
4. कविताओं पर।
उत्तर 1. लघु पत्रिकाओं पर

3. डॉ. प्रेम भारती इस समय सदस्य हैं
1. मध्य-प्रदेश शिक्षा मण्डल के
2. राज्य स्तरीय साधारण सभा के
3.कार्यकारिणी मध्य-प्रदेश सर्वशिक्षा अभियान के
4. उपर्युक्त दोनों के।
उत्तर 4. उपर्युक्त दोनों के।

10th Hindi Chapter 14 शबरी Solutions

4. डॉ. प्रेम भारती पैदा हुए थे.
1.1930 में
2. 1932 में
3. 1933 में
4. 1931 में।
उत्तर 3. 1933 में

5. डॉ. प्रेम भारती की कृतियों में स्वर है
1. समाजवादी
2. अध्यात्मवादी
3. व्यक्तिवादी
4. मानवतावादी
उत्तर MP Board 10th solutions

प्रश्न 2. रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों में से उचित शब्दों के चयन से कीजिए।

  1. राम ………….. से पता लगाते हुए शबरी की कुटिया पर आए। . (वनवासियों, मुनियों)
  2. स्वागत के ………….. वहाँ था। (सुविधान, अविधान)
  3. सूर्य आकाश का …………… लिए हुए खड़ा था। (दीप, प्रकाश)
  4. द्विजगण …………… सुना रहे थे। (वेदोच्चार, शोस्त्रोच्चार)
  5. श्रीराम के सिर पर …………… मुकुट थे। (स्वर्ण, जटा)

उत्तर- 1. मुनियों, 2. सुविधान, 3. दीप, 4. शाखोच्चार, 5. जटा

प्रश्न 3. निम्नलिखित वाक्य सत्य हैं या असत्य? वाक्य के आगे लिखिए।

  1. शबरी राम की अकचक देख रही थी। सत्य
  2. राम ने शबरी के द्वारा दिए हुए राजभोग को खाया। असत्य
  3. शबरी की कुटिया पर राम आये। असत्य
  4. शबरी के प्रति राम की भक्तवत्सल धारा बहने लगी थी। सत्य
  5. राम ने कहा कि वे इस कुटिया पर आकर आयोध्या को भूल गए हैं। सत्य

प्रश्न 4. सही जोड़ी का मिलान किजिए।

जलते हुए वन का वंसत – आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
भगवान महावीर – तुलसीदास
साहित्य लहरी – दुष्यंत कुमार
कवितावली – डॉ. प्रेम भारती
कालिदास की समालोचना – सूरदास।
उत्तर
जलते हुए वन का वंसत – दुष्यंत कुमार
भगवान महावीर – डॉ. प्रेम भारती
साहित्य लहरी – सूरदास
कवितावली – तुलसीदास
कालिदास की समालोचना – आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

MP Board 10th Hindi Chapter 14 शबरी pdf Solutions

प्रश्न 5. एक शब्द में उत्तर दीजिए।

  1. श्रीराम के रूप-सौंदर्य को देखकर कौन सब भूल गया था?
  2. किसके फूल अलक्षित थे?
  3. शबरी की कुटिया कहाँ थी?
  4. राम को कुटिया का वातावरण कैसा लगा?
  5. राम शबरी की बेर खाकर क्या हो गए?

उत्तर

  1. जड़-चेतन
  2. तारों के
  3. दण्डकवन में
  4. घर-सा
  5. अघा गए।

शबरी  लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राम शबरी की कुटिया तक कैसे आए?
उत्तर
राम शबरी की कुटिया तक मुनियों से पता लगाकर आए।’

प्रश्न 2.
शबरी को आत्मविभोर हुए देखकर राम ने क्या किया?
उत्तर
शबरी को आत्मविभोर हुए देखकर राम हँस दिए।

प्रश्न 3.
शबरी ने किस पर क्या रखी।
उत्तर
शबरी ने बेल-पत्र पर राम-लक्ष्मण के लिए थोड़े बेर रखे।

प्रश्न 4.
अन्त में श्रीराम ने शबरी से क्या कहा?
उत्तर
अंत में श्रीराम ने शबरी से कहा कि आज सचमुच में इस कुटिया पर मनुष्य के सभी प्रकार के विषाद मिट गए।

प्रश्न 6.
‘शबरी’ कविता में कवि ने किन नयी उदभावनाओं को प्रकट किया है?
उत्तर
‘शवरी’ कविता में कविवर डॉ. प्रेम भारती की लोकप्रिय कृति ‘शबरी’ से उद्धृत है। ‘शबरी’ के प्रख्यात पौराणिक प्रसंग में कवि ने कतिपय मौलिक और एकदम नयी उद्भावनाओं को प्रकट किया है। (MP Board Solutions) शबरी का हृदय श्रीराम के स्वागत हेतु प्रफुल्लता से परिपूर्ण हो उठता है। कवि ने शबरी के हृदय की उदारता और वात्सल्यता को संपूर्ण वन-प्रांतर तक विस्तारित कर दिया है। उन्होंने शबरी के भीतर जागते द्वंद्व का चित्रण करते हुए उसकी स्वाभाविक आत्म-गरिमा का एक साथ चित्रण किया है।

प्रश्न 7.
शबरी का मन विहल (आत्म-विभोर) क्यों हो गया?
उत्तर
शबरी का मन विह्वल (आत्म-विभोर) हो गया। यह इसलिए उसकी कुटिया पर स्वयं राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ आए थे। दूसरी बात यह है कि श्रीराम का रूप-सौंदर्य अनोखा था। वे साँवले थे। सोने के समान उनका शरीर चमक रहा था। उनकी आँखें कमल के समान थीं। उनके सिर पर सुंदर जटा-मुकुट था। वे धनुष-बाण और तरकश लिये हुए थे। इस प्रकार अपनी शारीरिक सुंदरता से अत्यधिक मन को मोह रहे थे।

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प्रश्न 8.
‘शबरी’ कविता के माध्यम से कवि ने कौन-सा संदेश प्रकट किया है?
उत्तर
‘शबरी’ कविता के माध्यम से कवि ने यह संदेश प्रकट करना चाहा है कि यद्यपि श्रीराम के स्वागतहित शबरी के पास उपयुक्त भौतिक संसाधन नहीं है, किंतु प्रेम से भरा हृदय तो है। कवि ने इस प्रसंग में राम की आँखों में आँसुओं की छलछलाहट लाकर उसे एक नाम स्मृति विधान प्रदान किया है। श्रीराम के आह्लाद उनकी तृप्ति और प्रेम प्रबलता को कवि ने प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। इस प्रकार कवि ने प्रस्तुत कविता में शबरी और राम के मिलन के माध्यम से कवि ने वनवासी बंधुओं के साथ राम की अनुरक्ति का चित्रण कर सामाजिक समरसता के संदेश को प्रकट किया है।

शबरी लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शबरी की कुटिया में कौन आया?
उत्तर
शबरी की कुटिया में राम-लक्ष्मण आये।

प्रश्न 2.
स्वागत का सुविधान से क्या आशय है?
उत्तर
स्वागत का सुविधान से आशय है-स्वागतहित हेतु उपयुक्त भौतिक संसाधन का होना।

प्रश्न 3.
द्विजगण क्या सुनाते हैं और क्यों?
उत्तर
द्विजगण शाखोच्चार सुनाते हैं क्योंकि उस समय वहाँ राम-लक्ष्मण उपस्थित थे।

प्रश्न 4.
शबरी का किस भाव को देखकर श्रीराम हँस पड़े?
उत्तर
शबरी के मन की विहलता को देखकर श्रीराम हँस पड़े?

प्रश्न 5.
शबरी ने राम-लक्ष्मण को खाने के लिए क्या दिए?
उत्तर
शबरी ने राम-लक्ष्मण को खाने के लिए मीठे-मीठे बेर दिए।

शबरी  दीर्घ-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्रस्तुत कविता में श्रीराम की छवि का वर्णन किस रूप में किया गया है?
उत्तर
प्रस्तुत कविता में श्रीराम की सरस, सरल और भक्तवत्सल छवि का वर्णन किया गया है।

प्रश्न 2.
राम-लक्ष्मण को अपनी कुटिया पर आया हुआ देखकर शबरी की दशा कैसी हो गई?
उत्तर
राम-लक्ष्मण को अपनी कुटिया पर आया हुआ देखकर शबरी की दशा विह्वल (गदगद) हो गई।

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प्रश्न 3.
शबरी ने श्रीराम-लक्ष्मण का सत्कार कैसे किया?
उत्तर
शबरी ने श्रीराम-लक्ष्मण का सत्कार उन्हें मीठे-मीठे बेर खिलाकर किया।

प्रश्न 4.
‘किंतु आज जो तृप्ति…कहा नहीं जाता।’ इस पंक्ति का केंद्रीय भाव लिखिए।
उत्तर
‘किंतु आज जो तृप्ति…कहा नहीं जाता।’
उपर्युक्त पंक्ति के द्वारा कवि ने श्रीराम की भक्तवत्सलता को चित्रित किया है। इसके द्वारा उसने यह सुस्पष्ट करना चाहा है कि श्रीराम दीनबंधु हैं। वे थोडी-सी भी भक्ति से रीझ जाते हैं।

शबरी  भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के समास विग्रह कीजिए
कमल-नयन, जड़-चेतन, कृपा-सिंधु, बनमाली।
उत्तर
शब्द – समास-विग्रह
कमल-नयन – कमल के समान नयन
जड़-चेतन – जड़ और चेतन
कृपा-सिन्धु – कृपा का सिन्धु
वनमाली – वन का माली।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए
गगन, कमल, जननी, दृग, वसंत।
उत्तर
शब्द – पर्यायवाची शब्द
गगन – आकाश आसमान
कमल – नीरज, जलज
दृग – आँख, नेत्र
वसंत – ऋतुराज, ऋतुपति।

प्रश्न 3.
कविता में ‘भोजन-भोजन’, ‘बेर-बेर’ जैसे पुनरुक्त शब्दों का प्रयोग हुआ है। पाठ में आए इसी प्रकार के पुनरुक्त शब्दों को छाँटिए।
उत्तर
‘पुनि-पुनि’, ‘चुन-चुन’, ‘नहीं-नहीं’, ‘युगों-युगों’, ‘खाते-खाते’ और ‘ला-ला’

प्रश्न 4.
“बेर-बेर में इन बेरों की
शबरी करता मृदुल सराह।” इन पंक्ति में बेर शब्द के कौन-कौन से अर्थ निकल रहे हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपयुक्त में ‘बेर’ शब्द से दो अर्थ निकल रहे हैं

  1. बेर = एक फल, और
  2. बेर = देर।

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शबरी  संदर्भ, प्रसंग सहित व्याख्या

1. और सत्य ही राम वहाँ पर,
पता लगाते मुनिगण से।
शबरी की कुटिया तक आये,
प्रेम रूप के मधुवन से॥

स्वागत का सुविधान वहाँ था,
स्वयं प्रकृति का उपमागार।
जड़ चेतन सब भूल गया था,
देख प्रभु का रूप-प्रसार॥

पीत पाँबड़े पड़े हुए थे,
वृक्ष के मधु बंदनवार ।
उससे चल कर ही कौशल-सुत,
आये. वे कुटिया के द्वार।

खड़ा गगन का दीपं स्वयं ही,
लिये सूर्य की ज्योति महान।
ताराओं के पुष्प अलक्षित,
धूप-आरती का भगवान।।

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द्विजगण शाखोच्चार, सुनाते,
शुभागमन में रघुवर के।
शबरी अकचक देख रही थी,
आज उन्हें जी भर-भर के।

शब्दार्च-मधुवन-उद्यान, बगीचा। सुविधान-संदर व्यवस्था। उपमागार-समानता या तुलना का भण्डार । पीत-पाँवड़े, पीले पैर । कौशल-सुत-दशरथ-पुत्र । अलक्षित-अक्षात, अदृश्य।

संदर्भ-प्रस्तुत पयांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी सामान्य 10वीं में संकलित कवि डॉ. प्रेम भारती विरचित कविता ‘शबरी’ से है।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने शबरी की कटिया पर श्रीराम के पहँचने और वहाँ के वातावरण का चित्र खींचते हुए कहा है कि

व्याख्या-मुनिगण से पता लगाते हुए श्रीराम शबरी की कुटिया पर आ गए। यों तो वहाँ पर उनके स्वागत की अच्छी व्यवस्था नहीं थी, फिर भी आकाश सूर्य की ज्योति को लिए हुए दीपक के समान स्वयं खड़ा था। तारों के अदृश्य फूल खिले हुए थे। धूप आरती स्वरूप थी। द्विजगण उस समय शाखोच्चार सुना रहे थे। यह सब कुछ शबरी चकित होकर देख रही थी।

विशेष-

  1. शबरी की कुटिया के आस-पास का प्रकृति-चित्रण है।
  2. सारा चित्रण मनमोहक है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर
(क) भाव-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश के भाव-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना सरल किंतु स्वाभाविक है। वन-प्रदेश के वातावरण को सटीक और अनुकूल रूप में ढालने का प्रयास प्रशंसनीय है। इस प्रकार मूल पद्यांश का भाव-सौंदर्य आकर्षक और रोचक बन गया है।

(ख) शिल्प-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश की शिल्प-योजना भावों पर आधारित है। भाषा की शब्दावली तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों से पुष्ट हुई है। शैली वर्णनात्मक, भावात्मक और चित्रात्मक तीनों ही है। प्रतीकों का यथास्थान होना आकर्षक बन गया है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश के द्वारा कवि ने शबरी की कुटिया पर श्रीराम के पहुँचने के उल्लेख से भक्त, भक्ति और भगवान के.विषय में प्रकाश डालना चाहा है। इससे भगवान राम की कृपालुता को उजागर कर कवि ने अपनी भक्ति-भावना प्रकट की है।

2. स्याम स्वर्ण तन कमल नयन थे,
जटा-मुकुट सिर पर अभिराम।
धनुष-बाण तरकश को धारे,
सुंदरता के कोटि ललाम।

MP Board Class 10th Hindi Solutions

दीर्घ नेत्र, कर सुभाग सलोने,
हाँ ये ही हैं अवध-भुवाल ।
लेशमात्र संदेह नहीं है,
आज हुई मैं अरे निहाल।

बंदन में क्या गीत सुनाऊँ,
कहाँ आरती का सामान।
उसकी मन विहलता पा कर,
हँसे तभी सानुज भगवान।

वाणी थी अवरुद्ध प्रेम में,
परम शांत थी हर्ष विभोर।
चरण पकड़ कर निरख रही थी,
पुनि-पुनि कृपा सिंधु की ओर।।

मृगच्छला का आसन देती,
शुद्ध स्वच्छ तब दोनों को,
और भोग हित बेर भेंट को,
लगी देखने कोनों को।

शब्दार्थ-स्याम-साँवला । स्वर्ण-सोना। तन-शरीर । नयन-आँख । अभिराम-सुंदर। कोटि-करोड़। दीर्घ नेत्र-बड़ी आँखें। सुभग-सुंदर। कर-हाथ । अवध-भुवाल-अयोध्या के राजकुमार। लेशमात्र-थोड़ा-सा। विहलता-व्याकुलता। अवरुद्ध-बंद। पुनि-पुनि-फिर-फिर।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने श्रीराम के अद्भुत रूप-सौंदर्य का चित्रांकन करते हुए कहा है कि

व्याख्या-श्रीराम का शरीर सोने के समान और साँवला था। उनकी आँखें कमल सी थीं, उनके सिर पर जटाओं का मुकुट शोभा दे रहा था। वे धनुष-बाण और तरकश को लिये करोड़ों सुंदरता को लजा रहे थे। उनकी आँखें बड़ी-बड़ी थीं। वे ही अयोध्या के राजकुमार हैं। उस समय शबरी यह नहीं समझ पा रही थी कि श्रीराम के स्वागत में कौन-सा गीत सुनाए। कहाँ आरती उतारे। उसे व्याकुल देखकर श्रीराम हँसने लगे। शबरी कुछ नहीं बोल पा रही थी। वह तो केवल श्रीराम के चरणों को निरख रही थी। वह उन्हें मृगछाला का आसन देकर राम और लक्ष्मण को बेर भेंट करने लगी थी।

विशेष

  1. भाषा में गति है।
  2. शैली वर्णनात्मक है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर

(क) भाव-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश की भावधारा सरस और प्रवाहयुक्त है। उसमें ओज, प्रभाव, गति, और क्रम है। श्रीराम के रूप-सौंदर्य का चित्रण आकर्षक है, तो शबरी की भक्ति की स्थिरता कम सराहनीय नहीं है।

(ख) शिल्प-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश की शिल्प-योजना सटीक भाषा और शैली की है। भाषा की शब्दावली में एकरूपता नहीं है, अपितु विविधता है। दूसरे शब्दों में भाषा के लिए प्रयुक्त हुए शब्द स्वरूप तत्सम, तद्भव और देशज तीनों ही हैं। शैली वर्णनात्मक और चित्रात्मक दोनों ही है।

MP Board 10th Hindi Chapter 14 sabri Solutions

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश में कवि ने एक ओर श्रीराम की शारीरिक संदरता के अद्भुत पक्ष को रखा है, तो दूसरी ओर शबरी की उनके प्रति भक्ति-भावना को दर्शाया है। ये दोनों ही पक्ष बड़े ही सटीक और उपयुक्त रूप में हैं। यही कवि का लक्ष्य है, जिसमें उसे सफलता मिली है।

3. उनसे चुन चुन कर जो मीठे
बेर नित्य वह लाई थी,
बड़े प्रेम से उनकों देने,
मन ही मन ललचाई थी।

कभी सोचती राज-भोग को,
किंतु अरे लेते हैं वे ।
नहीं-नहीं बनवासी होकर,
कंद मूल लेते हैं वे॥

अरे बेर में बेर न होवे,
स्वामी को थोड़ा अवकाश।
शीघ्र चलूँ मैं कुटिया में से,
आतुरता में देखे पास।

कहने लगी-‘क्षमा हो भगवान,
हुआ आगम में जो अपराध।
बेर भेंट को भोजन लाई,
युगों-युगों से मेरी साध’।

केल-पत्र पर दोनों को ही,
थोड़े उसने बेर रखे।
भक्त बछल ने खूब प्रेम से,
तभी उन्हें सानंद चखे॥

शब्दार्व-नित्य-रोज। आतुरता-उत्सुकता संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने शबरी की श्रीराम के प्रति प्रदर्शित भक्ति-भावना का चित्र खींचते हुए कहा है कि

व्याख्या-शबरी ने चुन-चुनकर मीठी-मीठी बेर श्रीराम को देने के लिए मन-ही-मन खुश होने लगी। वह यह सोचती और प्रयास करती कि श्रीराम राज-भोग को लेते रहे हैं तो वनवासी होकर कंदमूल को भी ले लेते हैं। इसलिए उन्हें बेर मिलने में कोई देर नहीं होनी चाहिए। यही सोच-समझकर वह अपनी कुटिया में आकर श्री राम से कहने लगी-भगवन् ! मुझसे अनजाने में जो अपराध हुआ है, उसे आप क्षमा कर दें। मैंने अपने युगों की साध को पूरा करने के लिए आपको ये बेर भेंट की। इस प्रकार कहकर शबरी ने केले के पत्ते पर राम-लक्ष्मण को थोड़ी-सी बेर रख दी। भक्तवत्सल भगवान् राम ने उन्हें बड़े आनंद के साथ खाया।

विशेष-

  1. शबरी की भक्ति भावना पर सीधा प्रकाश है।
  2. श्रीराम की भक्तवत्सलता को सामने लाया गया है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर

(क) भाव-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश की भावधारा सरस और स्वाभाविक है। शबरी की भक्तिभावना को इस दृष्टि से देखा जा सकता है। संपूर्ण मन को छू लेने वाले हैं, तो हृदय को जगा देने वाले भी हैं।

(ख) शिल्प-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का शिल्प-सौंदर्य सहज बिंबों, प्रतीकों व योजनाओं पर आधारित होने का फलस्वरूप मन को छू रहा है। भक्ति रस का सुंदर संचार है जिसे तुकांत शब्दावली से पुष्ट करने का प्रयास किया गया है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश का प्रतिपाय लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश में शबरी की भक्तिभावना को कवि ने समर्पित रूप में चित्रित किया है। दूसरे श्रीराम की भक्त-वत्सलता को आदर्शस्वरूप में अंकित किया गया है। कवि के ये दोनों प्रयास प्रेरक रूप में हैं, जो कवि का मुख्य अभिप्राय कहा जा सकता है।

4. आज उन्हें कुछ वर्ष बाद पुनि,
माता की सुधि घिर आई।
प्रेममयी जननी ही मानों,
भोजन ले कानन आई।

परम स्वाद आनंद उन्हें जो
राज-भोग में मिलता था।
उससे भी बढ़कर बेरों में,
स्वयं रसाम्बुज खिलता था।

स्मृति-बादल प्रेम अश्रु में,
प्रकट हुए दृग में आ कर!
शबरी काँप उठी यह देख
पूछ उसी हो भय बाहर।

‘क्या अच्छा हे नाथ न लगता,
बेर आप को यह वन का।’
‘चिंतित मत हो माता शबरी,
यह तो है जीवन तन का॥

‘फिर क्यों नाथ अश्रु को लाये,’
हँस कर कहते रघुराई।
‘तेरे बेरों के सुस्वादु से,
याद मुझे माँ की आई।

शब्दार्य-सुधि-याद। जननी-माता। कानन-जंगल। स्मृति-याद । दृग-आँख। अश्रु-आँसू।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने श्रीराम का शबरी द्वारा दी गई बेर को आनंदपूर्वक खाने का उल्लेख करते हुए कहा है कि

व्याख्या-श्रीराम को कुछ वर्षों बाद अपनी माता की याद ताजी हो आई। उस प्रेममयी माँ की ही याद ने मानो भोजन लेकर जंगल में आ गई। शबरी द्वारा दी गई बेरों को खाते हुए श्रीराम को राज-भोग के समान सुख और आनंद आ रहा था। इससे उनके प्रेमाश्रु छलकने लगे थे। उन्हें देखकर शबरी भयभीत हो गई थी। उसने श्रीराम से कहा कि क्या यह अच्छा होता कि आपका वनवास जल्दी ही समाप्त हो जाता। इसे सुनकर श्रीराम ने उसे संतुष्ट और निश्चिंत करते हुए कहा कि यह चिंतित न होवे; क्योंकि यही जीवन तन की स्थिति होती है। फिर उन्होंने कहा कि उसके सुस्वादिष्ट बेरों को खाने से उन्हें अपनी माता द्वारा राजभोग खिलाने की याद ताजी हो आई।

विशेष-

  1. श्रीराम के सहज और मधुर स्वभाव का चित्रण है।
  2. भाषा-शैली बोधगम्य है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर

(क) भाव-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश के भाव-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश की भाव-रूपरेखा सहज और बोधगम्य है। भाव-धारा में न केवल गति है, अपितु क्रमबद्धता भी है। ये भाव स्वाभाविक हैं। इसके साथ ही चित्ताकर्षक और मन को मोह लेने वाले हैं।

(ख) शिल्प-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश का शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश में प्रयुक्त हुई भाषा अधिक सरल और सपाट है। सामाजिक और अलंकृत शब्दावली इसके विशेष आकर्षण हैं। लय और संगीत का पुट देकर भक्तिरस में प्रवाहित करने का कवि प्रयास प्रशंसनीय है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश के द्वारा कवि ने श्रीराम के सहज स्वभाव का चित्रण आकर्षक रूप में किया है। उनके स्वभाव को कवि ने विश्वसनीय रूप में प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही कवि ने शबरी की भक्ति-भावना को भी कवि ने सहज ही रूप दिया है। शबरी की अनन्य भक्ति-भावना से श्रीराम की भक्तवत्सलता को छलकाना मुख्य रूप से कवि का यह प्रयास सफल कहा जा सकता है।

5. भोजन-भोजन सभी एक है,
किंतु वही है वर भोजन।
जहाँ प्रेम की धारा बहती,
और शांति का आयोजन।।

बेर-बेर मैं इन बेरों की,
शबरी करता मृदुल सराह।
और बेर मुझको दो सत्वर,
खाते-खाते बढ़ती चाह॥

इस कुटिया के द्वारा सभी में,
राज मार्ग को भूला हूँ।
गृह-सा वातावरण देखकर,
नववसंत सा फूला हूँ॥

बेर-बेर देती है शबरी,
बेर-बेर ही उनको बेर।
तो भी रघुवर बेर-बेर ही,
कहते हैं लाने को बेर॥

वह भी राघव को ला-ला कर,
खिला रही थी उन्हें हुलास ।
वन माली की सेवा करती,
पूर्ण भक्ति का पा विश्वास।

शब्दार्थ-वर-श्रेष्ठ। आयोजन-प्रबंध। मृदुल-कोमल। सराह-सराहना। सत्वर-निरंतर। चाह-इच्छा। राघव-श्रीराम।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने शबरी द्वारा श्रीराम को किस प्रकार बेर खिलायी जा रही थी, इसका चित्र इस प्रकार खींचते हुए कहा है कि

व्याख्या-यों तो भोजन तो भोजन होता है। लेकिन कौन-सा भोजन श्रेष्ठ है। इसे यों कहा जा सकता है कि जिस भोजन में प्रेम की धारा बहती है और जहाँ शांति का आयोजन होता है। वही भोजन श्रेष्ठ है। इसलिए शबरी द्वारा दी जा रही प्रेमरसीले बेरों को प्रशंसा करते श्रीराम चख रहे थे। उन्हें खाने से उनकी चाह बढ़ रही थी। वे इस प्रकार शबरी की कुटिया के द्वार के सामने सभी राजमार्ग को भूल चुके थे। उन्हें तो वहाँ का वातावरण घर के वातावरण की तरह ही नए वसंत के समान मन को छूने वाला लग रहा था। उन्हें इस प्रकार देखकर शबरी बार-बार बेर चखने के लिए दे रही थी। उधर श्रीराम उन्हें बहुत जल्दी-जल्दी चख-चखकर और बेर लाने के लिए कहने लगे थे। उनके आदेश के अनुसार शबरी उन्हें बड़े ही प्रेमपूर्वक बेर लाकर खिला रही थी। इस प्रकार वह श्रीराम के प्रति अपनी सच्ची भक्ति-भावना समर्पित कर रही थी।

विशेष

  1. श्रीराम की भक्तवत्सलता का स्पष्ट चित्रण है।
  2. भाषा-शैली वर्णनात्मक और चित्रात्मक दोनों ही है।

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सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर

(क) भाव-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश की भाव-धारा सहज रूप में है। श्रीराम की भक्त-वत्सलता का जहाँ निखरा हुआ रूप यहाँ प्रस्तुत हुआ है। वहीं शबरी की अनन्य और समर्पित भक्तिधारा पूरे प्रवाह में है। इस प्रकार ये दोनों चित्र मन को गदगद कर रहे हैं।

(ख) शिल्प-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश का शिल्प-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का शिल्प-सौंदर्य तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों से निर्मित भाषा और भावात्मक-चित्रण शैली से मण्डित है। पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार और उपमा अलंकार के योग आकर्षक हैं। भक्ति रस से पूरा पद्यांश उमड़ रहा है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव श्रीराम की भक्तवत्सलता और शबरी की समर्पित भक्ति-भावना को प्रकट करने का है। इसे कवि ने अपनी विशेषता का परिचय देते हुए प्रस्तुत किया है। कवि की यह प्रस्तुति प्रेरक रूप में है।

6. तभी लखन से बोले भ्राता,
“लेहु बेर यह मीठा चाख ।
लो यह है उससे भी अच्छा,”
पुनः बन्यु को देते, भाख॥

दोनों ने ही सुधा समाने,
खाये बेर उदर भर के।
रामचंद्र तब शबरी से यों,
बोले मुदित बदन करके।।

“मुनियों के आश्रम होता मैं,
दण्डक वन में आया हूँ।
अमित भाँति के सत्कारों से,
मैं परितृप्त अपाया हूँ”।

किंतु आज जो तृप्ति यहाँ पर,
मुझे मिली है, हे! माता।
नयन मौन हैं, कण्ठ अलेखा,
कुछ भी कहा नहीं जाता।

देकर उसे प्रेरक बनाने का प्रयास किया है। इसके लिए कवि ने भाव और शिल्प के सौंदर्य को ऊँचाई देना उपयुक्त समझा है। हम देखते हैं कि कवि का यह प्रयास सफल और प्रभावशाली है।

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