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वह शख़्स जिसने भारत को महामारियों की दो वैक्सीन दी और करा विरोध का सामना

वाल्डेमर मोर्डेकई हाफ़किन

यूक्रेन के ओदेसा के वाल्डेमर मोर्डेकई हाफ़किन का भारत पहुंचना उनके जीवन का एक संयोग ही था. और जीवन के

सबसे महत्वपूर्ण 22 वर्ष उन्होंने यहीं गुजारे.लेकिन उन्हें इन समय में कई विरोध का सामना करना पड़ा. हाफ़किन ने सेंट

पीट्सबर्ग से डॉक्टरेट की लेकिन जार रुसी साम्राज्य में एक यहूदी होने के कारण उन्हें प्रोफेसर नहीं बन सके,

लेकिन उन्हें प्रोफेसर बनाना था और कुछ बड़ा करना था इसीलिए उन्होंने रूस को छोड़ दिया और जेनेवा चलें गए.

जेनेवा में उन्हें फिजियोलॉजी पढ़ाने का काम मिला लेकिन उन्हें इससे भी संतुस्टी नहीं मिलीं और अपने गुरु लुई पास्चर

के पास पेरिस चले गएँ.हाफ़किन को पास्चर इंस्टीट्यूट में लाइब्रेरियन सहायक का पद मिला,लेकिन बैक्टीरियोलॉजी

का अपना अध्ययन उन्होंने जारी रखा, और जल्द ही हैज़ा की वैक्सीन बनाने की ओर मुड़ गया.

हाफ़किन ने इस वैक्सीन का पहले मुर्गेऔर गिनीपिग पर परीक्षण किया और फिर खुद को वैक्सीन का इंजेक्शन लगाया था.

उन्होंने जो वैक्सीन तैयार की थी, उसके दो इंजेक्शन एक तय असमय में लगवाने पड़ते थे. जब इस वेक्सीन

से संतुस्ती हुई तो उन्होने इसका पड़े पैमाने पर उपयोग करने का सोचा मगर उनके

इसे फैसले से कई विशेषज्ञ असहमत थे, और उनके गुरु लुइ पास्चर ने भी सहमत नहीं थे.

वैक्सीन का भारत में हुआ विरोध

हाफ़किन के एक वैक्सीन को कई विशेषज्ञ गलत साबित कर चुके थे, और कहने लगे की हैजा आंतों

के भीतर का रोग हैं. जिसमें वैक्सीन कामयाब नहीं हो सकती।लेकिन कुछ समय बाद उनकी मुलकात

ब्रिटेन के राजदूत लॉर्ड फ्रेडरिक हेमिल्टन डफ़रिन से हुई ,उससे भारत के वाइसराय भी थे. उ समय भारत में

बड़े पैमाने पर हैज़ा फैल चुका था. ब्रिटेन के राजदूत का मन वैक्सीन का इस्तेमाल बंगाल में होना चाहिए और हाफ़किन

को भारत भेज दिया था. 1893 मार्च में हाफ़किन कोलकाता पहुंचे तो कई तरह के उनके वैक्सीन के विरुद्ध

विरोध हो रहे थे. ये विरोध उनके वैक्सीन पर भरोसा न होने के कारण हो रहा था. जर्नल ऑफ़ मेडिकल

बायोग्राफी का कहना था, परिस में उन्होंने जिस जीवाणु पर सारे प्रयोग किए हैं, भारत में हैज़ा

फैलाने वाले जीवाणु की किस्म उससे अलग है, इसलिए इसका कोई फायदा नहीं होने वाला है.कहा जा रहा था

की भारत में लोग महामारी को देवी आपदा मानते हैं, जिसके लिए अलोपेथिक दवा भी नहीं लेते हैं. तो वे

इंजेक्शन कैसे लगवाएंगे। इन सभी विरोध के बाद भी हाफकिन ने अपनी प्रयोगसाला बना ली,

और जब तक वे बंगाल पहुंचे तब तक वहां सी हैजा समाप्त हो चुका था

लेकिन पंजाब और अवध प्रान्त में हैजा अभी तक था।

पड़े पैमाने पर दुनिया में हुआ पहले वैक्सीन का प्रयोग

उस समय सेना में इसका प्रकोप ज्यादा फेल रहा था , जिससे सेना ने हाफकिन से संपर्क किया

और उत्तर भारत की छावनियों में घूम घूम कर दस हजार सैनिकों को हाफकिन के इंजीक्तिओं लगाएं गए.

प्रयोग सफल रहा और देश भर में वैक्सीन की मांग होनी लगी. कोलकाता में फिरसे हैजा लोटा चूका था

जिसमे हाफकिन की करीब 42 हजार मजदूरों और जेल के लोगों को दिया गया और इस वैक्सीन को दुनिया का पहला

सबसे बड़े परिक्षण मन जाता हैं. लेकिन यहाँ पर भी हाफकिन की मुसीबतें काम नहीं हुई, उन्होंने इस वैक्सीन का नया

संस्करण तैयार किया जिसमें एक ही इंजेक्शन लगवाने की जरूरत रह गई थी.और

व्यूबोनिक प्लेग वैक्सीन

जब भारत में हैजा का प्रकोप ख़तम हुआ उसी समय भारत में व्यूबोनिक प्लेग ने दस्तक दी,

प्लेग का डर लोगों में हैजा से ज्यादा था क्यूंकि प्लेग आधे से ज्यादा लोगों की जान ले रहा था,

इस बार भी वैक्सीन तैयार करने की जिम्मेदारी हाफ़किन को दी गईऔर उन्हें इसके लिए मुंबई बुलाया गया.

जहां ग्रांट मेडिकल कॉलेज में उनके लिए प्रयोगशाला बनाई गई. 1896 में तीन महीने के अंदर उन्होंने वैक्सीन त्यारा कर

खरगोश पर सफल परिक्षण कर लिया, और उन्होंने उसी वैक्सीन की तरह अपने ऊपर प्रयोग किया फिर

भायखला जेल के कैदियों पर किया गया उस समय जेल के कैदियों पर ऐसी वेक्सीन का प्रयोग हुआ करता था,

वैक्सीन का प्रयोग करनी के लिए करीब 150 जेल कैदियों को प्लेग से संकर्मित किया गया वेक्सीन के पहले ही दिन

तीन कैदियों की मोत हो गई. अगले कुछ सफ्ताह में कैदियों की और भी मोठे हुईं और फिर भी इस वैक्सीन को सफल

माना गया पकलेग संकर्मित इलाकों में इस वैक्सीन के एक हजार इंजेक्शन लगाए गए। दुनिया में इस वेक्सीन को

मोटे टूर पर सफल मन गया लेकिन एक आकलन में कहा गया की यह 50% प्रतिशत मामलों में ही

सफल हुई है. लेकिन एक महामारी में पचास फीसदी लोगो को बचा लेना उप्लब्धि ही मन जायेगा।

वैक्सीन से हाफकिन आरोप

हाफ़किन अगले कुछ समय तक इस वैक्सीन पर देशभर में प्रयोग करते रहे. लेकिन इसी दौरान पंजाब के एक गांव मुल्कोवाल में एक ऐसी घटना हो गई

जिसे चिकित्सा के इतिहास में मुल्कोवाल डिज़ास्टर कहा जाता है.30 अक्टूबर 1902 को इस गांव में 107 लोगों को यह वैक्सीन दी गई.

कुछ रोज़ बाद 19 लोगों में टिटनस के लक्षण पाए गए और जल्द ही उन सब की मौत हो गई. इसका आरोप हाफ़किन पर आया और

उन्हें बर्ख़ास्त कर दिया गया. ये ख़बर इतनी फैली कि बात ब्रिटेन के हाउस ऑफ़ कॉमन्स तक में उठी. हाफ़किन पेरिस लौट गए

और वहां से चिट्ठियों के ज़रिये अपना बचाव करते रहे. आगे जांच हुई तो पता चला कि उनकी कोई गलती नहीं थी.

उनके एक सहायक ने वैक्सीन की बोतल पर गंदा ढक्कन लगा दिया था जिससे यह समस्या पैदा हुई. फिर हाफ़किन भारत लौटे लेकिन

इस बार उन्हें कोलकाता की बायोलॉजिकल लेब्रोटरी का निदेशक बना दिया गया लेकिन शायद उन्हें उनके आरोप

अभी भी उनपर थे क्यूंकि उन्हें वहां वैक्सीन शोध के लिए कोई भी चीजों की व्यवस्था नहीं कराया।

हाफकिन के वैक्सीन को कई लोगों ने नाकारा मगर वह उस वैक्सीन में कामयाब हुए इससे हमें यह प्रेणा भी मिलती है

की कोशिश करना हमे बंद नहीं करना चाहिए कोशिश करर्ते रहना चाहियें।

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